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मंदी के कारण खोखली हो रही है भारतीय अर्थव्यवस्था!

by Mahima Bhatnagar
budget

नई दिल्ली। भारतीय अर्थव्यवस्था जो अपनी तेजी धीरे-धीरे खो रही है। जिसके कारण अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित हो रहा है। इस मांग का भुगतान करने के लिए सरकार भी अपनी तरफ से हसंभव कोशिश कर रही है, ताकि इस समस्या को जल्द से जल्द खत्म किया जा सके। अगर वो जल्द से जल्द इस मुसीबत से छुटकारा नहीं पाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था और नीचे गिर जाएगी।

इस साल के अप्रैल-जून के महीने में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 5 साल में 5 % से भी कम हो गया है। यह लगभग दो साल पहले इसी अवधि में देखी गई लगभग 8% की वृद्धि की भारी गिरावट है। हालांकि, चौंकाने वाली बात यह है कि यह 5% की वृद्धि भी भारत की संशोधित जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) आकलन पद्धति में चार साल पहले शुरू की गई अड़चनों को देखते हुए हो सकती है।

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अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि, जीडीपी वृद्धि के अलावा, आर्थिक संकेतकों के एक मेजबान के आधार पर, अर्थव्यवस्था भाप खो रही है।

गंभीर समस्याओं से घिरी अर्थव्यवस्था

Indian economy

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भारतीय बैंकिंग व्यवस्था अभी एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) की मार को झेल रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, वर्तमान में कुल एनपीए 9,49,279 करोड़ रुपये का है। एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) का 50% हिस्सा तो महज देश के 150 बड़े पूंजीपतियों की वजह से हुआ है।

हां, यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही होगा कि पिछले 4 सालों में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के एनपीए में कमी आई है। लेकिन, यह भी याद रखना होगा कि पिछले 5 सालों में मोदी सरकार ने बड़े पूंजीपतियों के ₹5,55,603 करोड़ के लोन माफ कर दिए हैं। Source- (The Economic Times).

बैंकिंग सेक्टर में दिक्कतें

Banking sector

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बैंकिंग व्यवस्था एनपीए के साथ-साथ बैंकिंग फ्रॉड की भी समस्या से जूझ रही है। जो डाटा सामने आया है उसमें पिछले 11 सालों में आरबीआई के अनुसार 53,334 घटनाएं बैंकिंग फ्रॉड की हुई हैं। इसकी वजह से 2.05 लाख करोड़ रुपये का नुकसान बैंकों को झेलना पड़ा है। जिसकी वजह से बैंकिंग सेक्टर की हालत अभी भी खस्ता चल रही है। जिसको सही करने में सरकार लगी हुई है।

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ऑटोमोबाइल की बिक्री में दिखी गिरावट

Automobile sector

ऑटो सेक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस सेक्टर के कारण कुछ हद तक अर्थव्यवस्था स्थिर बनी रहती है। लेकिन इस सेक्टर में भी लगातार गिरावट देखी जा रही है। अगस्त महीने से लेकर अब तक ऑटोमोबाइल की बिक्री में लगभग 25% की गिरावट देखी गई है। जिसके कारण इस क्षेत्र में श्रमिकों की बड़े पैमाने पर छंटनी देखी गई है।  यह पूरी जीडीपी का 7.50 फीसदी और मैन्यूफैक्चरिंग में 49% हिस्सा रखता है। हाल ही में आए आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में पैसेंजर वाहनों की बिक्री में 18.4% की कमी आई है। वर्तमान में आ रही रिपोर्टों को आधार मानें तो यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि अगर यह मंदी ऐसे ही चलती रही तो ऑटो सेक्टर में तकरीबन 10 लाख लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ सकती है।

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इसके अलावा, निर्यात और आयात में वृद्धि पिछले पांच वर्षों में धीमी हो गई है और उसी अवधि में औसत वार्षिक औद्योगिक विकास दर बढ़ी है। इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) द्वारा मापा जाता है, यह एक निराशाजनक 3.5% है। Source- (qz.com)

प्रारंभ में, मोदी सरकार ने इन संकेतकों को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि “न्यू इंडिया” एक निजी खपत की अगुवाई वाली कहानी है, जिसमें बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किया जाता है, जो कि बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करता है, जो आधिकारिक आंकड़ों में पर्याप्त रूप से कब्जा नहीं करता है। फिर भी, हाल ही में रेस्तरां एग्रीगेटर ज़ोमेटो में छंटनी जैसी घटनाएं, इस आधिकारिक रुख के कारण उड़ जाती हैं, और सरकार इसे नाकार नहीं सकती।

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इन सालों में अच्छी रही अर्थव्यवस्था

2011-12 में अर्थव्यवस्था में काफी सुधार देखने को मिला। उस समय पूर्ण जीडीपी 2.3% देखी गई, वहीं आने वाले सालों में भी वार्षिक वृद्धि दर में काफी तेजी देखी गई। 2013-14 के लिए, पुरानी श्रृंखला में 4.2% की तुलना में नई श्रृंखला द्वारा जीडीपी 6.8% की वृद्धि हुई। विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि -0.7% से बढ़कर 5.3% हो गई। Source-(Hindustan.com)

अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए इन बातों पर देना होगा ध्यान

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भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत सरकार में कमजोर आंकड़ों पर चल रही है। मोदी सरकार 2.0 के पहले पूर्ण बजट के बाद से बाजार में निवेशकों का 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक डूब चुका है। Source- (Aaj tak)

सरकार निर्णय लेने के बजाय इन आंकड़ों पर महज प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। कुछ बड़े संस्थागत सुधारों के बजाय भारतीय अर्थव्यवस्था नीतियों की अनियमितता को झेल रही है। नोटबंदी आर्थिक सुधार की जगह एक बड़ा आर्थिक संकट बनकर सामने आया। जिसने हर किसी को हिला कर रख दिया। चाहे वो जनता हो, या फिर सरकार। फैसला बड़ा था लेकिन उसपर अमल करते-करते अर्थव्यवस्था की हालत ढीली हो गई, जिसको सही करने में सरकार को काफी मेहनत करनी पड़ रही है। इसने लोगों की ही नहीं पूरे देश की अर्थव्यवस्था को बिगाड़ कर रखा हुआ है। वहीं जीएसटी जिसे एक बहुत बड़े सुधार के रूप में बताया गया, उसकी भी बाजार में हालत खराब देखने को मिल रही है।

हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया कि, जीएसटी अपने स्वभाव के अनुरूप काम नहीं कर रहा है। इसका बाजार पर असर पड़ रहा है। सरकार को समझना होगा कि छोटे बदलाव संस्थागत सुधार नहीं कहे जाते हैं। अर्थव्यवस्था में जारी गिरावट लंबे समय तक टिकने वाली दिख रही है। लिहाजा, सरकार को अर्थव्यवस्था में बड़े और व्यापक बदलाव करने होगे, वरना अर्थव्यवस्थान दिन पर दिन गिरती चली जाएगी। जिसके कारण लोग बेरोजगार हो जाएंगे।

इसलिए सरकार को देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए अहम कदम जल्द से जल्द उठाने होंगे, वरना देश में बेरोजगारी बढ़ जाएगी। जिसका असर सबसे ज्यादा देश के युवाओं पर पड़ेगा, जो देश का भविष्य हैं, उन्हें ही आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा तो, देश अर्थव्यवस्था कैसे आगे बढ़ेगी? सवाल कई हैं लेकिन जवाब आज भी किसी के पास नहीं है। हर कोई सरकार से सवाल पर सवाल कर रहा है, जिसका जवाब अभी तक कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं दे रहा है। अब बस उम्मीद इतनी है कि, जो भी हो देश की अर्थव्यवस्था के हित में हो।


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