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तमिलनाडु की राजनीति पर पैनी नज़र

by Mahima Bhatnagar
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तमिलनाडु की राजनीति को हम और आप समझ सकते है दो युग में बांटकर पहला द्रविड़ आंदोलन के पहले का युग और दूसरा द्रविड़ आंदोलन के बाद का युग। पहले इसको मद्रास स्टेट के नाम से जाना जाता था और 14 जनवरी 1969 को इसका नाम बदलकर तमिल नाडु किया गया। P. S. Kumaraswamy Raja आधिकारिक तौर पर मद्रास स्टेट जो की अब तमिल नाडु राज्य है उसके पहले मुख्यमंत्री थे। उसके बाद C. Rajagopalachari ,K. Kamaraj और M. Bhakthavatsalam कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री रहे। द्रविड़ आंदोलन के पहले के युग में कांग्रेस का दबदबा रहा तो द्रविड़ आंदोलन के बाद Dravida Munnetra Kazhagam ने सत्ता संभाली। तमिल नाडु के राजनीति को समझने के लिए पहले समझते है द्रविड़ आंदोलन का इतिहास।

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द्रविड़ आंदोलन द्रविड़ आंदोलन की शुरुआत धार्मिक विश्‍वासों, ब्राह्मणवादी सोच और हिंदू कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए हुई थी। आंदोलन का जनक महान समाज सुधारक ईवीके रामास्‍वामी ‘पेरियार’ को माना जाता है।

डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कडगम) ने तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन के जरिए पेरियार के विचार को अपनाया और राजनीति में अपनी जगह बनाई। पेरियार ने 1944 में द्रविड़ कडगम का गठन किया, लेकिन 1949 में पेरियार के बेहद करीबी सीएन अन्‍नादुरै का उनके साथ मतभेद हो गया। अन्‍नादुरै ने 17 सितंबर, 1949 में द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) की स्‍थापना की। पेरियार स्‍वतंत्र द्रविड़ देश की मांग कर रहे थे जबकि अन्‍नादुरे की की मांग अलग राज्‍य की थी और वो पेरियार के उलट राजनीति में आना चाहते थे।

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फिर 1965 में हिंदी को देश की एकमात्र सरकारी भाषा बनाए जाने के ऐलान के विरोध में तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया और ये आंदोलन के फलस्वरूप C. N. Annadurai 1967 में मुख्यमंत्री बने लेकिन 1969 में उनके असामयिक मृत्यु ने एक बार फिर राजनितिक संकट ला दिया। और उस संकट में मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला V. R. Nedunchezhiyan जो की सिर्फ 5 दिन ही मुख्यमंत्री रह सके और उन्हें M. Karunanidhi के लिए सत्ता छोड़नी पड़ी। करुणानिधि के नेतृत्व को जल्द ही उनके सबसे करीबी दोस्त एमजी रामचंद्रन ने चुनौती दी , जिसे एमजीआर के नाम से जाना जाता है। ये वही एमजीआर है जिनको राजनीति में लाने में करूणानिधि का अहम् योगदान कहा जाता है। उन्होंने DMK से अलग होकर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का गठन किया(AIADMK) नाम की पार्टी बनायीं और तब से तमिल नाडु की राजनीति इन दोनों ही पार्टी DMK और AIDMK के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है।

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1972 में, उन्होंने डीएमके से अलग होकर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का गठन किया(AIADMK)। 1987 में उनकी मृत्यु तक वह 1977 से राज्य के मुख्यमंत्री थे।एमजीआर की मृत्यु के बाद, पार्टी फिर से दो गुटों में विभाजित हो गई, एक का नेतृत्व एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन और दूसरे का नेतृत्व जे। जयललिता ने किया ।। 1989 के विधानसभा चुनावों में AIADMK की हार के बाद, दोनों गुटों का विलय हो गया और जयललिता ने पार्टी का नियंत्रण ले लिया। उन्हें एकीकृत AIADMK के महासचिव के रूप में चुना गया था। DMK और AIADMK दोनों में विभाजन हुआ है, लेकिन 1967 से उन दोनों दलों में से एक ने राज्य में सत्ता संभाली है। एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद राज्य चुनावों में, दोनों दलों में से कोई भी लगातार विधानसभा चुनावों में सत्ता में वापस नहीं आ सका। हालांकि ये मिथक टूटा 2014 में जब AIDMK अम्मा कैंटीन के बदौलत दोबारा सत्ता में वापसी की।

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तमिल नाडु में एक बार फिर चुनाव है और ये चुनाव अपने आप में ख़ास है क्यूंकि करूणानिधि और जयललिता के मृत्यु के बाद ये चुनाव द्रविड़ राजनीती के उत्तराधिकार का भी चुनाव है। इसमें एक तरफ है Edappadi K. Palaniswami जिनको EPS के नाम से भी जाना जाता है और दूसरे तरफ है stalin जो की करूणानिधि के उत्तराधिकारी है। ये चुनाव में AIDMK जहां 10 साल के एंटी इंकम्बेंसी और कोरोना महामारी को लेकर घेरे में है तो स्टालिन पर अपने आपको साबित करने का दबाव है।

केरल

भारत सरकार के राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1नवम्बर 1956नई केरल राज्य बना। नई केरल को बनाया गया त्रावणकोर – कोचीन स्टेट दोनों ही को मिलकर । इसके बाद एक नई विधानसभा भी बनाया गया , जिसके लिए चुनाव १९५७ में हुआ और दुनिया की पहली लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित एक कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली सरकार बनाई और इसके साथ E. M. S. Namboodiripad केरल के पहले मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद केरल की राजनीती CPI (M ) और कांग्रेस के इर्द गिर्द घूमती रही है हालांकि बीच में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और आल इंडिया मुस्लिम लीग ने एक दो बार चुनौती देने की कोशिश की है।

केरल की राजनीती में या तो CPI (M) वाले गठबंधन LDF या कांग्रेस वाले गठबंधन UDF का दबदबा रहा है। इस बार फिर LDF और UDF गठबंधन आमने सामने है और इस लड़ाई में LDF कोरोना में किये गए कार्यो की बदौलत बाज़ी मारने को तैयार है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन जनता में काफी लोकप्रिय है और उनका विरोधी गठबंधन में आपस में ही फुट है जिसके कारण मजबूत चुनौती का आभाव पिनाराई विजयन के लिए लाभदायक है।

हालंकि भाजपा इस बार इ श्रीधरन के चेहरे के बदौलत मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में लगी है।

पुडुचेरी

पुडुचेरी में बीजेपी तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी एआईएडीएमके के साथ मिलकर लड़ रही है। इसके अलावा AINRC के साथ भी बीजेपी ने हाथ मिलाया है। वहीं कांग्रेस ने डीएमके के साथ चुनावी समर में उतरने का फैसला लिया है। इस बार मुख्य मुकाबला इन दोनों ही गठबंधन में है।

प्रतिनिधि सभा की धारा 54 (3) के अनुसार के रूप में 1जुलाई 1963को पांडिचेरी को विधान सभा में परिवर्तित कर दिया गया केंद्र शासित प्रदेशों अधिनियम में । Edouard Goubert जो की तब पंडीचेर्री था के पहले मुख्यमंत्री थे। इसके पहले 1नवंबर 1954को वास्तविक तथ्य विलय के बाद और 16अगस्त 1962को भारतीय संघ के साथ कानूनी एकीकरण से पहले, 1955और 1959में भी यहां आम चुनाव हुए थे। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में हाल ही में फ्लोर टेस्ट में असफल रहने के बाद कांग्रेस की नारायणसामी सरकार गिरी । इस फ्लोर टेस्ट के पहले विधायकों ने पाला बदलकर बीजेपी गठबंधन के साथ चले गए और नारायणसामी सरकार अल्पमत में आ गयी।

बीते कुछ सालों में बीजेपी ने यहां तेजी से अपनी पैठ बनाई है और माना जाता है की पुडुचेरी की राजनीति में आमतौर पर तमिलनाडु से प्रभावित रहती है। ऐसे में डीएमके भी यहां बड़ा फैक्टर होगी। 6 अप्रैल को होने वाले चुनाव में जनता किसका साथ देगी ये 2 मई को पता चलेगा और जो भी होगा उसकी जानकारी और विश्लेषण लेकर ट्रेंडिंग न्यूज़ आप तक आएगा। ट्रेंडिंग न्यूज़ के तरफ से हम हर चुनावी राज्य के नागरिक से अपील करते है की वो वोट ज़रूर डाले ये आपका अधिकार है और जिम्मेवारी भी। साथ ही कोरोना से जुड़े गाइडलाइन्स का भी पालन करते रहे। जय हिन्द जय भारत।

असम

अब बात पूर्वोत्तर का वो राज्य जो अपनी पहचान और अस्मिता के लिए लड़ाई लड़ रहा है की। असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई। उनको जाना जाता अपने योगदान के कारण जिसके कारण असम चीन और पूर्वी पाकिस्तान से बच के भारत का हिस्सा बन पाया। सैयदा अनवरा तैमूर 6दिसम्बर 1980से 30जून 1981तक असम की मुख्यमंत्री रही और वो सम्पूर्ण स्वतंत्रत भारत की भी प्रथम मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री थी। तरुण गोगोई को असम के सबसे लम्बे कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहने का सौभाग्य प्राप्त है। वो 15साल तक असम के मुख्यमंत्री रहे।

मुख्य मुकाबला कांग्रेस AIUDF गठबंधन और बीजेपी असम गण परिषद् BPF गठबंधन के बीच।

असम में बहुत बड़े पैमाने पर बांग्लादेश से हिन्दू और मुस्लिम प्रवासी आये और बस गए और ये बहुसंख्यक आबादी होने लगे और असम में रहने वाले असली नागरिक अल्पसंख्यक। इससे असम की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान के लिए खतरा उत्पन्न होने लगा जिसके कारण बोडो समाज ,Deori, Kachari, Karbi, Dimasa ,सोनेवाल इत्यादि एकजुट होकर सरकार से असम समझौता लागू करने का दबाव डाल रहे है।

यही कारण है की असम जहां के चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है NRC का सही तरीके से इम्प्लीमेंटेशन और CAA या का विरोध। असम की जनता इस चुनाव में दो भागो में बंटी है असमी और बाहरी।

क्या है ये मुद्दा इसके बारे में थोड़ी जानकारी हम आपको देते है।

केंद्र और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए समझौते को असम समझौता या असम एकॉर्ड कहा जाता है। इसपर 1985में स्वतंत्रता दिवस पर हस्ताक्षर किया गया औरअसम समझौते के 15खंडों में, जो प्रमुख फोकस क्षेत्र थे वो निम्न है :

विदेशियों का मुद्दा

  • आर्थिक विकास
  • विदेशियों द्वारा अचल संपत्ति के अधिग्रहण पर प्रतिबंध
  • सरकारी भूमि का अतिक्रमण रोकना
  • जन्म और मृत्यु का पंजीकरण
  • यह स्थानीय लोगों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया गया था।
  • असम समझौते का खंड 5विदेशियों के मुद्दे से संबंधित है, अर्थात असम में विदेशियों का पता लगाना, मतदाताओं की सूची से उनके नाम हटाना और व्यावहारिक माध्यम से उनका निर्वासन।
  • अब देखना ये है की ये चुनाव सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे हावी रहेगा या फिर जातीय ,धार्मिक या छेत्रिय ध्रुवीकरण । इसका पता तो 2 मई को जब चुनाव परिणाम आएंगे तभी चलेगा।

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